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आदमी जब *पत्तल* में खाना खाता था

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आदमी जब *पत्तल* में खाना खाता था, मेहमान को देख के वह *हरा* हो जाता था, स्वागत में पूरा परिवार बिछ जाता था.... बाद में जब वह *मिट्टी के बर्तन* में खाने लगा, रिश्तों को *जमीन से जुड़कर* निभाने लगा.. फिर जब *पीतल के बर्तन* उपयोग में लेता था, रिश्तों को *साल छः महीने* में चमका लेता था... लेकिन बर्तन *कांच* के जब से बरतने लगे,  एक *हल्की* सी चोट में रिश्ते बिखरने लगे ... अब *बर्तन*, थर्मोकोल पेपर के इस्तेमाल होने लगे, सारे *सम्बन्ध* भी अब *यूज़ एंड थ्रो* होने लगे ...  🙏✍✍अर्जुन भास्कर ✍✍🙏

फिर आई स्कूल की यादें

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फिर आई स्कूल की यादें वह छोटी-छोटी शरारत के इरादे काश मैं फिर से जा पाता स्कूल करता बहाना अब याद आता है वह पुराना जमाना शरारत भरी मस्ती दिलों में उमंग थी  हमारी ग्रुप देखकर मैडम भी जंग थी हमारा स्कूल हमारा ग्रुप हमारा बस्ती हमको जो छू लेते थे उनकी बिगाड़ देते थे हंसती जब यारों के यार मिला करते थे स्कूल के बहाने अब याद आते हैं सभी यार ,वह प्यार भरे सहारे स्कूल के बच्चों को देखकर लगता है फिर से बच्चा बन जाऊं और फिर से स्कूल जाऊं और यही रीत दोहराव यही रीत दोहराव काश मैं फिर से स्कूल जा पाऊं हँसते खेलते गुजर जाये वैसी शाम नहीं आती... होंठों पर अब बचपन वाली मुस्कान नहीं आती!! लेखक - अर्जुन भास्कर मोबाइल नंबर-  7 99 9 1 4 55 02