संदेश

दिसंबर, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पुरखा के सुरता गुरू दोहा

चित्र
सत्रहवि सदि आये बबा,बन महगू के लाल गिरौदपुरि के माटि मा,बसाए सत के ढाल हे सतपुरुस गुरू बबा, धराए तय सतनाम मूरख रहि चोला हमर, बसाये सत गियान सतखोजन करे तय तप,छोड़के मोह-काम छाता-पहड़ रमाय धुनि,गिरौदपुरि के धाम सबो मनखे कहे एके,सब जिव कहे समान         परनारी माता सही,नारी घर के मान घरघर फइले चीखला,नसा-दारु हे भाइ मदिरा-माँस ल छोड़के,कर सतबीज बुआइ जूवा तास हे अपजस,ओ धन काम न आय चोरी-लुट  ले  दूर रइ,पुरही  तोर  कमाय देव रहिथे सबोजघा,त काबर कहू जाय अपन घर सुमरले ग तै,उहेच दरसन पाय सब धरम एक बरोबर ग,माता पिता समान ककरो चुगली झिन कर ग,इही गुरु के गियान जैत खम्भा मान हमर,झन्डा हे अभिमान सादा-सत के चीनहा,सत के हे परमान छुवाछूत जग रोवत ल,करे बबा सनहार सबगलि हहाकार रहिच,कर देहे परहार धरति रोए कापे सुरज,रहीच मनुबीचार सतनामे परकास रख,करदेहे उजियार आसिस दे महुला बबा,जयजय हे सतनाम भास्कर परनाम करय,बाबा के परमान ▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪▪ लेखक- अर्जुन भास्कर मोबा :- 7999145502

कविता : देश के नाम यह कविता लिख रहा हूँ

चित्र
लेखक: अर्जुन भास्कर  नमन देश के वीरो को!💐 देश के नाम यह कविता लिख रहा हूँ   गाथा इसकी पल पल गुनगुना रहा हूँ। कभी उथल पुथल इसकी तस्वीर होती   पर इसकी मर्यादा का गीत लिख रहा हूँ।। कभी कल कल बहते सरिताओं में   खुद को यूं लहराता देखने लगता हूँ। कभी हिमाचल की ऊंची चोटी देख   हवाओं से बेफ़िज़ूल इतराने लगता हूँ।। देश के नाम यह कविता लिख रहा हूँ   गाथा इसकी पल पल गुनगुना रहा हूँ। चाँद अब यूं चंद पलो का सफर हैं   कि भारत की कामयबी बयां कर रहा हूँ।। नील आकाश से समंदर तक झांक लो   सारे जहाँ से अच्छा हर पत्तो से सुन रहा हूँ। क्यों नफ़रतों की रुमाइश रखते हो दिलो में   जी हाँ, मैं पुलवामा की ही बात कर रहा हूँ।। देश के नाम यह कविता लिख रहा हूँ   गाथा इसकी पल पल गुनगुना रहा हूँ। क्यों आते हैं विनाश हमारे इस तहज़ीब में   इन्ही सवालों को आज भटकते देख रहा हूँ।। बिलखते मासूमो को रोते सुन रहा हूँ   ग़रीबो की झुग्गियाँ ढहते नालो में पा रहा हूँ। अखंड भारत का ख़्वाब अधूरा लग रहा हैं   कि मेरा भारत आज सुना सुना लग रहा हैं।। ...